Google वेब प्राइमरी का मास्टर

1.1.13

जीवन चलने का नाम : बस इतना सा ही ख़्वाब है!

जीवन चलने का नाम
कल 2012 था और आज 2013 की नयी सुबह!

वास्तविकता यह है कि इस एक वर्ष के बुढ़ाने में हम अधिक अनुभवप्रज्ञ हुए होंगे? अधिक जानकारियों से लैस हुए होंगे? हमारे पास अधिक आत्मानुशासन आया होगा? हम और अधिक शक्तिशाली हुए होंगे ......बल बुद्धि और विवेक से?

पर इन परिवर्तनों का हम अपने लिए, आपके लिए और समाज के लिए क्या उपयोग कर सकें........सबसे अधिक यही महत्वपूर्ण है। हम शिक्षकों और चिट्ठाकारों की इस रूप में समाज में भूमिका और प्रभावी होनी चाहिए! अपने पास, पड़ोस और परिवेश में हम आप क्या अधिक और सकारात्मक कर सकते हैं यह चिंतन इस नूतन वर्ष 2013 में भी चलता रहे ऐसी परमात्मा से उम्मीद है?

समाज में जो जैसा है की चलताऊ भावना से परे हटकर कुछ और अच्छा बनाने की सतत कोशिश की लौ जलती रहे ...... इस भावना से ही हम सबको नए वर्ष में प्रवेश करना चाहिए। आइये हम सब शपथ लें कि हम सब शिक्षक परिवर्तन के वाहक बनेंगे ......परिवर्तन अपने अन्दर, परिवर्तन अपने विद्यालयों में, परिवर्तन अपने परिवेश में और परिवर्तन अपने समाज में।
बस इतना सा ही ख़्वाब है !

कुल मिलाकर मौजा ही मौजा हो।
वर्ष 2013 तुम्हारा स्वागत है!
आप सबको शुभकामनाएं!

इस अवसर पर यह ब्लॉग स्कूल पता नहीं कितने दिन बंद रहेगा?

2.10.12

खुद वो बदलाव बनिए ....


"हर  काम की एक अपनी गरिमा है, और हर काम को अपनी पूरी क्षमता से करने में ही संतोष मिलता है।"
►लाल बहादुर शास्त्री


 "खुद वो बदलाव बनिए जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।"
►महात्मा  गांधी 


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फीडबर्नर

15.1.12

जो गुरु बसै बनारसी, सीष समुन्दर तीर

रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार, प्रारम्भ में ही ज्ञान शिक्षा का आश्रम स्थापित करने के लिए गुरु की आवश्यकता पड़ती है। शिक्षक तो आवेदन करते ही लाइन लगा देते हैं, पर गुरु तो फरमाइश करते ही,  नहीं मिल सकते।। प्रस्तुत है कबीर के नजरिये से सम्बंधित चौथी कड़ी.....



गुरु  सामान दाता नहीं, याचक सीष समान ।
तीन  लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्हों दान ।।

गुरु के समान कोई दाता नहीं, और शिष्य की तरह कोई याचक नहीं। गुरु ने तीनों लोक की संपदा से भी बढ़कर ज्ञान का दान जो दे दिया है।




जो गुरु बसै बनारसी, सीष समुन्दर तीर ।
एक पलक बिसरे नहीं, जो गुण होय शरीर ।।

यदि गुरु बनारस (काशी) में निवास करें, और शिष्य समुद्र के नजदीक हो, यदि शिष्य के शरीर में गुरु का गुण होगा, तो वह गुरु को एक क्षण भी नहीं भूल सकता। (यहाँ बनारस और समुद्र के माध्यम से गुरु शिष्य के मध्य प्राकृतिक दूरी को बताने की चेष्ठा की गयी है।)



आजकल 'कबीर' पर कुछ अध्ययन मनन चल रहा है और उसका परिणाम है यह पोस्ट और आगे "कबीरवाणी" और "गुरु" लेबल के अंतर्गत आगे आने वाली क्रमिक पोस्ट्स। समय के प्रवाह में शायद इसी बहाने इनपर कुछ नया विमर्श मिल सके इस आशा के साथ "गुरु" केंद्रित कबीरवाणी आगे भी क्रमशः प्रस्तुत की जायेगी। कबीर की गुरु भक्ति उस चरम बिदु पर थी जहाँ उन्होंने कहा है-
"गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।"
क्रमशः  जारी ...


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